• Srijan Pal Singh

डिजिटल शिक्षा के लिए चाहिए नया निवेश

As published in Amar Ujala (National Edition) on October 22, 2020

कोविड-19 ने मार्च 2020 से ही, पूरे भारत में 40,000 कॉलेजों और 15 लाख स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद करने पर मजबूर कर दिया। साल 2020 के अंदर वैक्सीन की संभावना जहाँ धूमिल हो रही और लंबे समय तक इस संक्रमण के जारी रहने की आशंका है, वहीं पूरी दुनिया की तरह ही, हमारे देश की शिक्षा प्रणाली डिजिटल शिक्षा के युग की एक नई सच्चाई से रूबरू हो रही है।


जब से कोरोना वायरस की शुरुआत हुई, तभी से भारत के सबसे बड़े ऑनलाइन एजुकेशन प्लेटफॉर्म बाईजूस ने 1.5 करोड़ नए छात्रों को अपने साथ जोड़ा और आज इसके शेयरों की कुल कीमत लगभग 80,000 करोड़ रुपए है, जो भारत के स्कूल और साक्षरता शिक्षा बजट का लगभग सवा गुना है। ज़्यादातर ऑनलाइन प्रतियोगिता परीक्षा की ट्रेनिंग देने वाले, अनएकेडमी के 3 करोड़ से भी ज़्यादा रजिस्टर्ड यूज़र हैं, जिनमें से अधिकांश उसके साथ मार्च 2020 के बाद जुड़े।


ज़्यादातर कॉलेजों और स्कूलों ने शिक्षा के ऑनलाइन तरीके को अपना लिया है क्योंकि इसके लिए कम खर्च वाले प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं। डिजिटल शिक्षा प्रणाली कोई नई बात नहीं है। भविष्य इसी का था, बस इतना हुआ है कि कोविड-19 के कारण इस परिवर्तन में तेजी आई है।


पारंपरिक शिक्षा के मुकाबले डिजिटल शिक्षा प्रणाली के कुछ स्पष्ट फायदे और समस्याएँ भी हैं जिन्हें समझना आवश्यक है।


इसमें कोई शक नहीं कि डिजिटल शिक्षा के प्लेटफार्म तेज़ी के साथ अपने छात्रों की संख्या बढ़ा सकते हैं । चंद मिनटों में ही बाईजूस अपने सर्वर में इतना स्पेस बना लेता है कि कुछ हज़ार नए छात्रों को उसमें जोड़ा जा सके, जबकि पुरानी भौतिक संरचना वाली व्यवस्था में उतने छात्रों के लिए इमारत खड़ी करने और सुविधाओं का इंतज़ाम करने में सालों का वक्त लगता था।


आज हमारे पास कॉलेज की अपनी व्यवस्था में सीटों का कोटा बढ़ाने का एक बड़ा अवसर है, जिसका फायदा करोड़ों छात्रों को मिल सकता है। अकेले दिल्ली राज्य में ही, हर वर्ष २.५ लाख बच्चे स्कूलों से पास होते हैं लेकिन कॉलेजों में उनके एडमिशन के लिए राज्य में महज 1.25 लाख सीट हैं।


इसमें शक नहीं कि डिजिटल प्रणाली पूरी तरह से भौतिक संरचना की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता है। उदाहरण के लिए, प्रयोगशाला से जुड़े काम के लिए छात्र कहाँ जाएँगे? इसके लिए हम एक हाइब्रिड प्रणाली पर काम कर सकते हैं जिसमें डिजिटल और भौतिक स्वरूप दोनों को ही शामिल करें। साथ ही, डिजिटल रूप से इंटरएक्टिव लैब बनाने के लिए हम वर्चुअल और ऑगमेंटेड रियलिटी का इस्तेमाल कर सकते हैं।


डिजिटल शिक्षा को लेकर शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आने की आशंका जताई जाती है। अब प्रश्न ये है कि भारतीय स्कूलों की गुणवत्ता आज कहाँ ठहरती है? भारत ने लंबे समय से स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के बजाए ज़्यादा से ज़्यादा स्कूल खोलने पर ज़ोर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ कि भारत में चीन से लगभग 3 गुना ज़्यादा स्कूल हैं, जबकि दोनों की आबादी लगभग बराबर है। लेकिन 4 लाख के करीब स्कूल ऐसे हैं जिनमें से हर एक में 50 से कम छात्र हैं और मात्र एक या दो शिक्षक हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर नहीं हो सकती है। भारत में कम से कम 10 लाख शिक्षकों की कमी है। और आज जितने शिक्षक हैं वे ज़्यादातर शहरी इलाकों में हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में एक शिक्षक पर 100 छात्रों की ज़िम्मेदारी होती है। यह समस्या सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं है। एएसईआर 2018 की रिपोर्ट बताती है कि 5वीं कक्षा में पढ़ने वाले ग्रामीण निजी स्कूलों के 35% छात्र दूसरी कक्षा के स्तर का पैराग्राफ नहीं पढ़ पाते हैं। डिजिटल एजुकेशन में अच्छे से अच्छे शिक्षक इंटरनेट के ज़रिए बच्चों को सीधे पढ़ा सकते हैं, और इंटरनेट अगर हर छात्र के लिए उपलब्ध हो जाए, तो शिक्षा का न्याय भारत के कोने-कोने तक पहुँच सकता है।


डिजिटल एजुकेशन में छात्र अपनी ही रफ्तार से पढ़ सकेंगे। छात्र दूसरे कौशल को सीखने में अपना अधिक समय दे सकेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शिक्षकों को अपने नियमित कामों को पूरा करने में मदद देगी और रचनात्मक सामग्री तैयार करने के साथ ही वे अपनी मौजूदा जानकारी के भंडार को समृद्ध बना सकते हैं। इससे हर छात्र की ज़रूरत के अनुसार सामग्री तैयार करने में मदद मिलेगी और पढ़ने के साथ ही पढ़ाने में भी सहयोग बढ़ेगा।


लेकिन तीन बड़ी चुनौतियाँ भी हैं।


डिजिटल शिक्षा देना जहाँ निश्चित रूप से किफायती है, वहीं कम आमदनी वाले समूह के छात्रों के लिए इसे हासिल करना महँगा हो सकता है। सर्वेक्षणों से जानकारी सामने आई है कि मात्र एक तिहाई अभिभावक ही अपने बच्चों के लिए डिजिटल शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं। इंटरनेट के साथ एक डिजिटल स्क्रीन पर साल में कम से कम 6,000 रुपए का खर्च आएगा। इस हिसाब से भारत में सीमित आय वाले वर्ग के सभी बच्चों तक इसे पहुँचाने में 80,000 करोड़ रुपए का खर्च आ सकता है। एक समस्या यह भी है कि ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था में युवाओं में सामाजिक कौशल का विकास कैसे किया जाए। ऐसी ढेर सारी बातें हैं जो एक छात्र अपने साथियों और शिक्षकों के बीच रहकर आमने-सामने की बातचीत से सीख सकता है – ऑनलाइन शिक्षा में यह कैसे संभव होगा?


स्वास्थ्य पर ऑनलाइन शिक्षा के प्रभाव से निपटने पर भी हमें सोचना होगा, विशेष रूप से छोटे-छोटे बच्चों के मामले में। कुल मिलाकर, इसकी संभावना अधिक है कि आने वाले समय में हमें शिक्षा के मिले-जुले तरीके को आगे बढ़ाना पड़े, जिसमें पूरी शिक्षा व्यवस्था में डिजिटल एजुकेशन का एक बड़ा हिस्सा शामिल होगा। कोरोना संकट ऐसा अवसर है जब हमारी शिक्षा प्रणाली एक बड़ी छलांग लगा सकती है । लेकिन नए प्रयोग के साथ हमें नए निवेश करने के लिए भी तैयार रहना होगा ।


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