• Srijan Pal Singh

नम्बरों की खतरातनक होड़



As published in Dainik Jagran (National Edition) on July 18, 2020

एक बार एक किसान ने एक चतुर व्यापारी से पूछा "मैं अपने गेहूं की बाली की लंबाई कैसे बढ़ा सकता हूं?"


व्यापारी बोला "अपने खेत पर मेहनत करके"


किसान ने जवाब दिया "मुझे और मेहनत नहीं करनी। कुछ आसान रास्ता बताओ।"


हंसते हुए चालाक व्यापारी ने बोला, "फिर अपने नापने का पैमाना ही छोटा कर लो। बाली अपने आप लंबी लगने लगेगी।"


कुछ यही हाल हमारे बोर्ड परीक्षा का है। अगर हम रिजल्ट को देखें ऐसा लगता है की अलग-अलग बोर्ड आपस में सबसे ज्यादा नंबर देने की प्रतिस्पर्धा में है। सीबीएसई के 12वीं के नतीजों में इस वर्ष 38,000 से भी अधिक छात्रों के 95% से ज्यादा नंबर हैं। पिछले वर्ष यह आंकड़ा 17,000 था । 90% से ज्यादा अंक 158,000 छात्रों के आए जो पिछले साल 94,000 थे। पिछले साल टॉपर का एक नंबर कटा था और इस बार सीबीएसई में टॉपर को 600 में से 600 अंक दे ही डाले।


अगर आपने मेरी तरह शताब्दी के पहले दशक में या उससे पहले अपनी बोर्ड परीक्षा दी है तो आपको पता होगा कि किसी भी भाषा या इतिहास जैसे विषय में शत प्रतिशत अंक लाना असंभव था। 2008 में 1.5% छात्र 90% के ऊपर आग लाते थे, इस वर्ष यह आंकड़ा 15% है। सोचने की बात है कि हमारे स्कूलों में ऐसा क्या हो गया कि टॉपर्स की संख्या 10 गुनी हो गई? गेहूं की बाली बढ़ी है या नापने का पैमाना छोटा हो गया?


90% आने वाला बच्चा आज सोशल मीडिया से नज़रें चुराता है और 97% वाले को भी पता नहीं कि क्या उसे कॉलेज में एडमिशन मिलेगा।


बढ़ते हुए अंको से सबसे ज्यादा फायदा स्कूलों और कोचिंग इंस्टीट्यूट को होता है। लगे हाथ बोर्ड भी अपनी पीठ थपथपा लेता है कि उसने इस बार बेहतरीन नंबरों वाली एक नई नस्ल बना डाली।


मगर नंबरों की अंधी दौड़ में हारने वाला सिर्फ एक है - देश का युवा। डेढ़ सौ साल पुरानी परीक्षा पद्धति जिसमें सारा ध्यान सिर्फ तथ्यों को याद रखने में होता है, को पकड़ कर भारत की शिक्षा व्यवस्था 21वीं सदी का युवा तैयार करने में लगी है। नंबरों के खजाने बटोरने में लगे बच्चे शायद ही कभी सिलेबस के बाहर जाकर ज्ञान की खोज में लगते हैं। किताबों के वह पन्ने जिससे परीक्षा में सवाल नहीं आते, वह बिना पल्टे ही पड़े रहते हैं। दुनिया के बच्चों को रटने से हटाकर रचनात्मक बनाने पर लगी है, तब हम परीक्षा को और भी आसान बना कर बेहतर नंबर दिखाने में लगे हैं। प्रतिशत बनाने की इस मृगतृष्णा में युवाओं की जिज्ञासा का हमने दमन कर दिया। फिर हम कैसे अपेक्षा करें की यह युवा हटकर सोचें, उद्यमी बने या नोबेल पुरस्कार जीते।


जीवन में एक बहुत बड़ा गुण होता है कि किस प्रकार से हम अपना समय - जटिल और सरल प्रश्नों का हल करने में बांटे। कभी-कभी इसका अर्थ होता है कि जटिल समस्याओं का संपूर्ण समाधान हम नहीं निकाल पाते। मगर आज हमारी शिक्षा पद्धति सवालों को आसान करने की होड़ में जिससे कि छात्रों को सब कुछ सरल परोसा जाए। इसे दिखाने के नंबर तो मिल जाएंगे मगर जीवन शास्त्र के कुछ महत्वपूर्ण अध्याय हमने छोड़ दिए।


और इस अंक वर्धन का कोई विशेष लाभ छात्रों को भी नहीं मिलेगा। यह चलता रहा तो आगे चलकर कॉलेजों को बोर्ड अंकों को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए अपना अलग एडमिशन टेस्ट बनाना होगा। इससे बच्चों के अभिभावकों का खर्च बढ़ेगा, शिक्षा पद्धति जटिल होगी और सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों को होगा जो आर्थिक रूप से कमजोर है और बार-बार टेस्ट की फीस देने में उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी होगी।


गलती अभिभावकों की भी है। क्यों हम बच्चों के स्कूलों का चयन सिर्फ एक पैमाने तय करते हैं क्यों स्कूल में कितने बच्चे टॉपर हुए ? हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे जुकरबर्ग बने, कलाम बने, एलों मस्क बने, धोनी बने - मगर हम भूल जाते हैं कि इनमें से कोई भी सिर्फ अंको की होड़ में नहीं लगा था - इनमें से कोई भी क्लास का टॉपर नहीं था। 13-14 साल तक की गई शिक्षा को हम 3 घंटे के बोर्ड परीक्षा में पूरी तरह से आंक लेंगे यह सोचना नासमझी है - और दशकों से यह करते आ रहे हैं।


दुनिया में किसी भी सफल व्यक्ति से पूछिए कि उसका सबसे बड़ा हथियार क्या है ? जवाब मिलेगा असफलता से मिली सीख । क्या हम आज बच्चों को को यह सिखा रहे हैं कि जीवन के कुछ प्रश्नों पर असफलता भी हो मिल सकती है ? क्योंकि वास्तविक जीवन में को परिणाम कभी शत-प्रतिशत नहीं होते।


अंत में, मै उस कहानी पर आता हूं जहां से हमने शुरुआत करी थी।


… व्यापारी ने बोला था , "फिर अपने नापने का पैमाना ही छोटा कर लो। बाली अपने आप लंबी लगने लगेगी।"


किसान को यह बात अच्छी लगी। उसने पूछा "तो अगर मैं अपना पैमाना आधा कर दूं और मेरी बाली दुगनी लंबी हो जाए तो क्या तुम मुझे इसका दुगना दाम दोगे?"


व्यापारी तंग आकर बोला, "नासमझ मत बनो। मैं गेहूं के वजन का दाम देता हूं, बाली की लंबाई का नहीं !"


आज यही हाल हमारे शिक्षा व्यवस्था का है। बाली की लंबाई बढ़ाने के लिए हमने पैमाना छोटा कर दिया और गेहूं के वजन पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया।





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